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Saturday, March 6, 2021

सुपौल: महिलाओं के प्रति दोयम दर्जे के सोच से बाहर निकलने की है जरूरत



सुपौल।संतोष कुमार भगत/पप्पू मेहता
सदियों से नारी को एक वस्तु तथा पुरुष की संपत्ति समझा जाता रहा है। पुरुष नारी को पीट सकता है, उसके दिल और शरीर के साथ खेल सकता है। उसके मनोबल को तोड़कर रख सकता है, साथ ही उसकी जान भी ले सकता है। मानो कि उसे नारी के साथ यह सब करने का अघोषित अधिकार मिला हुआ है। उक्त बातों त्रिवेणीगंज अनुमण्डल क्षेत्र की युवा समाजसेवी दीपिका झा ने कही। उन्होंने यह भी कहा कि मगर यह भी सच है कि अनेक नारियों ने हर प्रकार की विपरीत और कठिन परिस्थितियों का डटकर सामना करते हुए उन पर विजय प्राप्त की और इतिहास में अपना नाम अमर कर दिया।
कहा आज की बदली हुई तथा अपेक्षया अनुकूल परिस्थितियों में नारियां स्वयं को बदलने और पुरुष-प्रधान समाज द्वारा रचित बेड़ियों से स्वयं को आजाद करवाने हेतु कृतसंकल्प हैं। बताया कि अब प्रश्न यह है कि नारी कितना बदले और क्यों? बताया कि एक ओर जहां भारतीय महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा ना मनवाया हो, सफलता के हर पायदान को इन्होनें अपने संघर्ष से पार कर नया इतिहास लिख दिया है। चाहे वह खेल जगत हो ,राजनीति, कला, बिजनेस, बैंकिंग या विज्ञान हर क्षेत्र में इन्होनें अपनी मेहनत से धाक जमाई है। सफलता के नये मायने गढ़े हैं। पहले से सर्वविदित पुरूषों के कार्यक्षेत्र में भी इन्होनें ना सिर्फ अपनी दस्तक दी है बल्कि इस पूरे कार्यक्षेत्र को बखूबी संभाला भी है। रजिया सुल्तान, गोंड रानी दुर्गावती, , जीजाबाई जैसी महिलाओं ने नारी जाति को गौरव प्रदान किया। कहा कि मीराबाई ने भक्ति रस की धारा बहाई और वे इतिहास की एक किंवदंती बन गईं। रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़कर उनके छक्के छुड़ा दिए। आजादी की लड़ाई में अनेक महिलाओं जैसे डॉ. एनी बेसेंट, विजयलक्ष्मी पंडित, अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी और कस्तूरबा गांधी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। बताया कि सुभाष चंद्र बोस की सेना की एक कैप्टन लक्ष्मी सहगल थीं , इंदिरा गांधी, प्रतिभा पाटिल, मीरा कुमार, सुमित्रा महाजन, सुचेता कृपलानी जय ललित, वसुंधरा राजे, ममता बनर्जी आदि मुख्यमंत्री बनी, किरण बेदी प्रथम महिला आईपीएस, कमलजीत संधू एशियन गेम्स में प्रथम गोल्ड पदकधारी, बेछेंद्री पाल एवरेस्ट पर प्रथम भारतीय महिला, मदर टेरेसा को नोबेल पुरस्कार, फातिमा बीबी प्रथम महिला जज सुप्रीम कोर्ट, मेधा पाटकर सामाजिक कार्यकर्ता जैसी अनेक महिलाओं ने पुरुषवादी समाज की सोच को धता बताते हुए अपनी बुद्धिमत्ता, नेतृत्व क्षमता और सामर्थ्य का परिचय दिया और इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करवा दिया।वहीं हमारे समाज में नैतिकता का पैमाना लड़का/लड़की, स्त्री/पुरुष सबके लिए बराबर होने के वजाय सामाजिक सोच अज़ीब है। पुरुष चोरी,डकैती, हत्या, बलात्कार, बेईमानी, धोखाधड़ी या और भी कई घृणित कार्य कर के नेता, मंत्री या अच्छे पद पर बैठ जाए तो वे उदाहरण के पात्र बन जाते हैं। लेकिन महिला मेहनत कर के अच्छी जगह पर पहुँच जाए तो फिर क्या कहना। समाज के लोगों की नींद चैन सब गायब....? घुसूर् फुसुर शुरू, फिर क्या- क्या कहा जाता है लिखने लायक तो बिल्कुल नहीं हैं। आखिर कब तक इस तरह की मानसिकता झेलनी पड़ेगी।
अक्सर स्त्रियों के पहनावे पर भी सवाल उठाये जाते हैं। व्यक्तिगत रूप से मैं सहमत हूँ कि यदि पुरुष पूरा बदन ढक सकते हैं तो महिलाओं को भी छोटे कपड़ों से परहेज करना चाहिए। कहते हैं कि "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता" अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती हैं वहाँ देवताओं का निवास होता हैं। मगर आज यथार्थ के धरातल पर जब हम देखते हैं, हमें बड़ी निराशा होती है। आज बड़े- बड़े मंच से हम कितनी भी नारी स्वतंत्रता की बात कर लें, उनके उत्थान की लाख दुहाई दे लें पर यह कटु सत्य है कि पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों के हालात बराबरी के नहीं हो पाए हैं। आज भी उन्हें दोहरे नजर से देखा जाता हैं। आए दिन अखबार, टेलीविजन, रेडियो के समाचार औरतों के साथ हो रहे जुर्म से रंगे रहते है। कहीं हत्या, कहीं बलात्कार , और भी कई बातें .....।
और हाँ दुर्भाग्यवश अक्सर जब किसी महिला या लड़की के साथ कोई दुर्घटना हो जाती है और वह हिम्मत कर अगर पुलिस थाना पहुँच जाए तो फिर होता ये है कि पुलिस थाना पर पहले तो काफी टाल - मटोल किया जाता है और तब यदि वह महिला या लड़की प्रार्थमिकी दर्ज करने के लिए अडिग हो जाए तो तरह- तरह के सवालों की बौछार लग जाती है। आपके साथ क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ, क्या सबूत है। 24 घंटे तक किसी तरह पीड़ित को घुमाना।फिर कारवाई आरंभ हुई तो मेडिकल, कचहरी का चक्कर और अंत में निदान अधिकांश मामलों मे कुछ नहीं हो पाता। महिलाओं से इतना सवाल क्यों ?
आज हम कितना भी आधुनिकता का लिवास ओढ लें, स्त्रियों का चौखट लांघना समाज को नहीं सुहाता। तरह- तरह के उपदेश, शहर में लड़कियों/महिलाओं को न अकेले रहना चाहिए, न अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। क्योंकि अकेली लड़की या महिला को देखकर लड़के/पुरुष भ्रमित होते हैं। बात करते समय लड़कियों को हँसना नहीं चाहिए अगर कोई हंसी- मजाक की बात हो तो चेहरे पर सीरियस एक्सप्रेशन होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं तो उसका कैरेक्टर खराब मान लिया जाएगा। पुराने जमाने की तरह लड़कियों का चूल्हा फूंकना, न लड़के के बराबर पढ़ने का हक, न नौकरी करने की छूट। मोबाईल तो देना ही नहीं। अंततः छोटी उम्र में शादी करा देना -बस उसी में समाज की जीत है।
कोई भी कदम पुरुष उठाए तो सही, महिला करे तो गलत- इस मानसिकता से तो उबरना हीं होगा।
आदि काल से राष्ट्र निर्माण में स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्त्री - पुरुष दोनों एक ही गाड़ी के दो पहिए के समान है। आइये मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करें जिसमें पुरुष- स्त्री के बीच कोई भेद भाव नहीं हो।बहरहाल सरकार को चाहिए की नारी उत्थान के लिए कार्य करें, क्योंकि बातें मंच व टीवी स्क्रीन के माध्यम से हमेशा से होती आई हैं। 
 महिलाओं के लिए बिल्कुल एससी - एसटी की तरह मजबूत कानून होनी चाहिए। देश के सबसे बड़े पंचायत लोकसभा एवं सभी विधानसभा में महिलाओं को अनुपातिक प्रतिनिधित्व का अधिकार मिलना चाहिए। हर जिले में अनुमंडल स्तर पर महिला समस्या निवारण कार्यालय होना चाहिए, महिला गश्ती टीम होनी चाहिए, जो तमाम सुविधाओं से पूर्ण हो। अगर कहीं भी महिलाओं के साथ कोई भी दुर्घटना घटती हैं तो बिना समय गवाएं त्वरित कार्यवाही हो। बिना टाल - मटोल किए जांचोपरांत आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा मिले।
अपने हक के लिए संपूर्ण नारी शक्ति को भी मजबूती के साथ आगे आना होगा तब जाकर समाज में बदलाव संभव हो पाएगा।

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