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Friday, February 12, 2021

BIHAR:14 फरवरी को मनेगा पूर्णिया का स्थापना दिवस... जानिए इस तीन सौ साल पुराने शहर का इतिहास

कोशी लाइव डेस्क:

पूर्णिया [दीपक शरण]। सदियों पूर्व पूर्णिया की पहचान कभी कालापानी तो कभी कालाजार व मलेरिया जोन के रूप में रही है। कालक्रम में यहां की भौगोलिक स्थिति, जलवायु और आवागमन की उपलब्धता के बीच शहरीकरण के दौर में पूर्णिया न सिर्फ एक सुंदर शहर के रूप में विकसित हुआ है बल्कि आने वाला समय भी इसके उत्कर्ष की गाथा लिखेगा। पूर्णिया को 1770 में जिला के अस्तित्व में आने की बात कही जाती है। जो उस समय 370 किमी के परिक्षेत्र में फैला था। यह दार्जिङ्क्षलग न्यायिक परिक्षेत्र में आता था। लेकिन वर्ष 2008 से प्रत्येक वर्ष 14 फरवरी को जिले का स्थापना दिवस मनाया जाना प्रारंभ हुआ।

एक जिले के रूप में इसकी पहचान 251 वर्ष पुरानी है। इन वर्षों में भौगोलिक बदलाव भी होते रहे। यह जिला कभी कालापानी तो कभी मलेरिया और कालाजार जोन के रूप में पहचान बनाता रहा। इन बीमारियों से लोगों की मौत हो जाती थी। उस समय से लेकर अब यहां लोग मेडिकल सुविधा के लिए लोग पहुंचते हैं। यहां राजकीय पूर्णिया मेडिकल कॉलेज का कार्य काफी तीव्र गति से चल रहा है। इसके साथ ही जिले की पहचान मेडिकल हब के रूप में भी की जाती रही है। इंजीनियर कॉलेज और पूर्णिया विश्वविद्यालय यहां पर है। स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ ही व्यापार में काफी तरक्की कर चुका है।

गुलाबबाग जैसी बड़ी मंडी जिले में मौजूद हैं। अब यह सपनों का शहर बन चुका है। साहित्यकार राम नरेश भगत बताते हैं कि 2008 में आई कोसी त्रासदी में आसपास का जिला बाढ़ के कारण डूब गया था लेकिन शहर बचा हुआ था। जिले में कुछ इलाके को छोड़ बाढ़ का प्रभाव भी कम ही रहता है। यह एक कारण रहा जिससे लोग इस शहर में बसने के लिए और धंधा करने के लिए आकर्षित हुए। इसके साथ ही फॉरबिसगंज-दरभंगा एनएच 57 फोरलेन बनने के बाद यह अन्य शहरों से सीधे जुड़ गया। इस कारण दूरियां घटी और आवागमन का साधन भी बढ़ा। अब यह रोजगार और व्यापार का केंद्र बनता जा रहा है। यहां पर हवाई अड्डा बनाने की योजना भी प्रस्तावित है। अब यह शहर सरपट दौड़़ लगाने के लिए तैयार है।

यहां पर रहने और रोजगार के लिए आसपास के जिलों से लोग पहुंच रहे हैं। यह बड़ा बदलाव है। बुजुर्ग समाज के अध्यक्ष भोलानाथ आलोक जिनकी उम्र 87 वर्ष हो चुकी है। उन्होंने बताया कि वे पूर्णिया में बदलाव के साक्षी रहे हैं। शहर में पीने की पानी तक की दिक्कत थी। अब लोग यहां पर बसना चाहते हैं। बेहतर मौसम के कारण यह शहर गर्मियों में लोगों को आकर्षित करता है। पूर्णिया की मिनी दार्जिङ्क्षलग के रूप में पहचान रही है। स्थापना दिवस के निर्धारण के लिए इतिहासकार प्रो. रामेश्वर प्रसाद के नेतृत्व में टीम का गठन किया गया था। कहते हैं ब्रिटेन तक तथ्यों को खंगाला गया तब तिथि का निर्धारण किया गया था।

पूर्णिया गीत से होती है जिले की अभिव्यक्ति

जिले की बड़ी सटीक अभिव्यक्ति गीत के माध्यम से हो सकती है। प्रो. तारिख जमेली ने पूर्णिया गीत की रचना की है। सज-धज देखो, दिन में चांदी शाम में सोना रूप, भीगी भागी शाखों पर हीरे जैसी धूप, शक्ल कटरे की समुंदर का जिगर रखते हैं। बांसूरी और फूस का रखतब है। रह के वादी में हिमाला पे नजर रखते हैं। यहां तो आज भी रातों में हंसते - बोलते हैं लोग फूल भरी शाखों पर तकते है लोग, यहां तंग जमीं ना ही आंसमा ही है सिकुड़ा।

पहले डीेएम थे डूकारेल

यहा के पहले डीएम डूकारेल थे। पूर्णिया की चर्चा आइने अकबरी में भी है। डूकारेल ने यहां की कमान संभालते ही सुधार के कई कार्य किए। मनमाने दंड को समाप्त किया और किसानों को परती जमीन जोतने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने न्याय, राजस्व और प्रशासनिक क्षेत्र में कई सुधार किए। पूर्णिया के इस इतिहास की अगर जानकारी मिलती है तो इसका श्रेय डुकारेल को भी जाता है।

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