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Thursday, December 17, 2020

बिहार के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन को सजा दिलानेवाले चंदा बाबू का निधन


सिवान । चर्चित तेजाब कांड के गवाह चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू का निधन बुधवार (16 दिंसबर) की देर शाम उनके आवास पर हो गया। स्वजनों ने उन्हें इलाज के लिए सदर अस्पताल लाया जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। सदर अस्पताल के चिकित्सकों ने बताया कि उनकी मौत हार्ट अटैक से हुई है। मौत की सूचना मिलते ही उनके आवास पर काफी संख्या में नेताओं सहित अन्य लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। सभी लोग उनके दिव्यांग पुत्र को सांत्वना दे रहे थे। चंदा बाबू पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे और घर पर ही रहते थे।

बता दें कि चंदा बाबू के दो पुत्रों को तेजाब से नहलाकर हत्या करने का आरोप राजद के पूर्व सांसद मो.

शहाबुद्दीन पर लगा था। इस मामले में शहाबुद्दीन को निचली अदालत से सजा भी हुई। यह मामला काफी चर्चित हुआ। इसके बाद उनके तीसरे पुत्र राजीव रोशन जो चंदा बाबू के साथ इस कांड का मुख्य गवाह था उसकी हत्या भी अपराधियों ने शहर के डीएवी मोड़ पर गोली मार कर दी थी। इसके बाद चंदा बाबू की पत्नी का निधन पिछले वर्ष हो गया। पत्नी के निधन के बाद वे अपने दिव्यांग चौथे पुत्र के साथ अकेले शहर के गौशाला रोड स्थित अपने आवास में रहते थे।

15 अगस्‍त 2004 से पहले खुशहाल परिवार था चंदा बाबू का

डर और कुछ भी अनहोनी होने की आशंका के बीच अत्याचार के विरुद्ध जंग लड़ने वाले साधारण व्यवसायी चंदा बाबू अंततः अपनी जीवन की जंग बुधवार की देर शाम हार गए। बावजूद इसके वे अपने पीछे एक ऐसी मिसाल छोड़ गए जो यह बयां करती है कि अदम्य साहस हो तो हर दर्द का इलाज संभव है। शहर के गौशाला रोड स्थित एक साधारण व्यवसायी चंद्रकेश्वर प्रसाद और चंदा बाबू के घर खुशहाली का माहौल 2004 के स्वतंत्रता दिवस के पूर्व तक सामान्य था। दो भाई में छोटे भाई चंदा बाबू सिवान रहकर अपने व्यवसाय संभालते थे जबकि एक भाई पटना में अधिकारी थे। चंदा बाबू का एक भरा पूरा परिवार था। पढ़ी-लिखी पत्नी और 4 बच्चे थे। 3 बच्चे अलग-अलग दुकानों पर व्यवसाय संभाल रहे थे जबकि एक बच्चा दिव्यांग होने की वजह से उन दोनों के साथ रहता था।

दबाव के बावजूद साहस नहीं छोड़ा

2004 में स्थिति तब बिगड़ी जब चंदा बाबू ने गौशाला रोड स्थित अपनी पुरानी आवास को नया रूप देना शुरू किया और उसमें एक छोटी सी कोटरी पर अनाधिकृत रूप से एक व्यक्ति ने गुमटी रखकर अपना दुकान चलाना आरंभ कर दिया। प्रारंभ में तो वह गुमटी एक दिखावे की थी, लेकिन जैसे ही निर्माण कार्य पूरा होने को था तो उस दुकानदार ने उस दुकान पर अपना कब्जा बनाना चाहा । इसी को लेकर पंचायती आरंभ हुई और 16 अगस्त 2004 को कुछ बाहरी तत्वों के दबाव बनाने पर चंद्रकेश्वर बाबू उर्फ चंदा बाबू के परिवार और बाहरी आगंतुकों के बीच झड़प हो गई। जान बचाने के उद्देश्य से चंदा बाबू के परिवार वालों ने कारोबार के उद्देश्य से रखे गए तेजाब को फेंक कर अपनी जान बचाई जिसमें बाहरी तत्वों के दो लोग गंभीर रूप से जख्मी हो गए । परिणाम स्वरूप प्रतिरोध के रूप में चंदा बाबू के दो पुत्रों को शहर के विभिन्न विभिन्न दुकानों से अपहरण कर लिया गया। मां कलावती देवी ने अपने दो बच्चों के अपहरण को लेकर मुफस्सिल थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई। प्राथमिकी दर्ज होने के पश्चात भी दोनों बच्चे प्राप्त नहीं हुए और अपहरण को लेकर मामला न्यायालय में स्थानांतरित हो गया। चंदा बाबू पर कई प्रकार का दबाव बनाया गया था कि मुकदमे को उठा लिया जाए, लेकिन चंदा बाबू का साहस ही था कि मामला तेजाब कांड के रूप में चर्चित हो गया।

शहाबुद्दीन को आजीवन कारावास की सजा

अपहृत दो लड़कों के साथ बड़ा लड़का राजीव रोशन उर्फ राजेश भी उसी समय से लापता था, लेकिन अचानक से वह 2015 में उपस्थित हो आया और न्यायालय में आकर मोहम्मद शहाबुद्दीन के विरुद्ध उसने गवाही दी और मामला अपहरण से हत्या के रूप में स्थानांतरित हो गया। अंततः तेजाब हत्याकांड की सुनवाई हुई और मोहम्मद शहाबुद्दीन सहित अन्य तीन को आजीवन कारावास की सजा विशेष अदालत द्वारा दी गई। मामले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील हुआ तदनुसार उच्चतम न्यायालय तक मामला गया और उच्चतम न्यायालय ने निचली अदालत की सजा को कंफर्म करते हुए मोहम्मद शहाबुद्दीन को तिहाड़ जेल तक पहुंचा दिया।

तीसरे पुत्र की हत्याकांड में भी थे गवाह

तेजाब कांड के मुख्य गवाह राजीव रोशन की भी हत्या 2015 में अपराधियों द्वारा कर दी गई। वह मामला न्यायालय में अभी लंबित है। चंद्र केश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू का जंग अभी यहीं समाप्त नहीं हुआ था ।बल्कि तेजाब कांड में मरे अपने बच्चों के विरुद्ध अन्य आठ अभियुक्तों के लंबित मामले में भी उनकी गवाही हो गई थी । जो एडीजे वन के न्यायालय में लंबित है । राजीव रोशन के हत्यारों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज थी वह मामला भी ट्रायल के स्तर पर था । यह दो महत्वपूर्ण मामले भी उनके लड़ाई के अंग थे। किंतु इंसाफ की लड़ाई लड़ते-लड़ते वह मानसिक रूप से भी कमजोर हो गए थे और उम्र ने शरीर का साथ देना छोड़ दिया था। अंततः वे जीवन की जंग के आगे अपनी हार मानते हुए अंतिम विदा ले ली। उनके परिवार में मात्र अब एक दिव्यांग पुत्र ही शेष है जो उनके धरोहर के रूप में है।

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