पूर्णियां/सिविल सोसाइटी दिवस पर शनिवार को वर्चुअल ई-जनजागरूकता कार्यक्रम का हुआ आयोजन - कोशी लाइव

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Saturday, August 1, 2020

पूर्णियां/सिविल सोसाइटी दिवस पर शनिवार को वर्चुअल ई-जनजागरूकता कार्यक्रम का हुआ आयोजन

दिव्यांगजनों के विकास से जुड़ा है समाज का विकास

- सिविल सोसाइटी दिवस पर शनिवार को वर्चुअल ई-जनजागरूकता कार्यक्रम का हुआ आयोजन 
- दिव्यांगजनों के विकास, राज्य और केंद्र के संचालित कार्यक्रमों पर हुई चर्चा
- युवाओं के साथ विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव, किया गया ई-संवाद

पूर्णिया, 1 अगस्त:

वैश्विक कोरोना महामारी के इस दौर में समाज को दिव्यांगजनों के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। दिव्यांगजन समाज के अभिन्न अंग हैं। इनके विकास का समाज में अहम योगदान होता है। इसलिए अपने साथ-साथ हमें इनके प्रति भी सकारात्मक सोच रखनी होगी। इसी कड़ी में समाज में दिव्यांगजनों के प्रति सिविल सोसाइटी के कार्यों को लेकर सिविल सोसाइटी दिवस पर शनिवार को वर्चुअल ई-जनजागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। ऑनलाइन माध्यम से ई-संवाद का आयोजन बिहार दिव्यांगजन समूह, इंडियन वॉलिन्टियर एसोसिएशन, बिहार एसोसिएशन ऑफ पर्सन्स विथ डिसेबिलिटी और बिहार सिविल सोसाइटी फोरम के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। इस कार्यक्रम से बिहार के 51 लाख दिव्यांगजनों और उनके परिवार के साथ ई-संवाद करने का लक्षय रखा गया था। 

राज्य निशक्तता आयुक्त डॉ. शिवाजी कुमार के अनुसार दिव्यांगजनों के प्रति नकारात्मक सोच को बदलने और लोगों में जागरूकता लाने के लिए इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। उन्होंने बताया कि ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन का उद्देश्य समाज में फैली कुरीतियों, नकारात्मक सोच या किसी व्यक्ति द्वारा झेले जा रहे परेशानियों का सामाधान करना होता है। साथ ही उन्होंने बताया कि इस दौरान कोरोना महामारी के काल में बेहतरीन कार्य करने वाले सिविल सोसायटी व दिव्यांगजन समूह के प्रतिनिधियों को ई-सर्टिफिकेट देकर सम्मानित भी किया गया।

कार्यक्रम में गीता ने साझा किए अपने अनुभव:
कार्यक्रम में पाकिस्तान से 15 समय बाद भारत वापस आई गीता ने अपने अनुभव बताए। सांकेतिक भाषा विशेषज्ञ ज्ञानेंद्र पुरोहित ने गीता के संकेतों की भाषा को साझा किया। गीता ने बताया कि वह ऐसा अनुभव करती हैं कि वे बिहार की रहने वाली हैं। उन्होंने अपील की कि अगर 15-20 साल पहले बिहार से किसी की बच्ची जो मूक-बधिर हो और घर से लापता हुई हो तो संस्थाओं से संपर्क कर उनसे मिल सकते हैं। वह अपने परिवार से मिलने के लिए आज भी प्रयासरत है। बता दें कि बोलने और सुनने में अक्षम गीता को पाकिस्तान से 26 अक्टूबर, 2015 को भारत लाया गया था। उसके आने के बाद से वह इंदौर स्थिति एक गैर सरकारी संस्थान के साथ रह रही हैं और सामान्य जीवन यापन कर रही हैं।

इन विषयों पर हुई विशेष चर्चा:
दिव्यांगजन, गरीब और लाचार व्यक्ति व बच्चों के विकास पर कार्यक्रम में विशेष रूप से चर्चा हुई। कैसे इस वर्ग के लोग समाज में अपना योगदान दे सकते हैं। कैसे ये सरकार के विकास की योजनाओं का लाभ ले सकते हैं और स्वयं को लाचार नहीं समझते हुए स्वयं के हुनर को निखार कर एक मुकाम पा सकते हैं इसपर चर्चा हुई। मोबाइल फोन, व्हाट्सएप से सूचना और जानकारी प्राप्त करने के साथ-साथ समुदाय के कार्यों और आयोजनों में इनके संपूर्ण भागीदारी पर भी बल दिया गया।

युवाओं ने रखे विचार, समाज से आगे आने का अनुरोध:
ई-संवाद में युवाओं ने अपने विचार रखते हुए दिव्यांगजनों के लिए कौशल विकास के कार्यक्रमों को चलाने पर ज्यादा जोर दिया। युवाओं, जनप्रतिनिधियों, खिलाड़ियों और समाज के लोगों को ज्यादा से ज्यादा समाज सेवा में आगे आने का अनुरोध करते हुए कहा कि अगर समाज का यह वर्ग आगे आएगा तो निश्चय ही इसका लाभ बड़े तबके तक जाएगा। उनका कहना था कि आसपास रहने वाले समाज के लोग और युवा ज्यादा अच्छे से दिव्यांगजनों की समस्या को देखते समझते है, इसलिए उनतक वे बेहतर रूप से समन्वय स्थापित कर उनके विकास में योगदान दे सकते हैं। कोविड 19 के इस दौर में यह काफी जरूरी हो गया है। कार्यक्रम में सूबे के विभिन्न जिलों, प्रखंडों व पंचायत से लोगों ने अपनी सहभागिता दी।

SAFTY ZONE[मधेपुरा]

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