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Monday, 21 October 2019

सहरसा:आमलोगों से अपील:दीवाली पर मिट्टी के दीये का करें प्रयोग,दीया बनाने वालों के जीवन से भी दूर करें अंधेरा

कोशी लाइव_नई सोच नई खबर।
अक्की।
सहरसा। दीपावली का त्योहार आमलोगों के साथ खासकर कुम्हार जाति के लोगों के लिए अपार खुशी लेकर आता है, परंतु अब यह बात नहीं रही। मिट्टी के दीया ओर ढिबरी की जगह अब चाईनीज लाइट लेता जा रहा है। बाजार में रंग- बिरंगे चाईनीज र्लाट के बढ़ते प्रचलन के कारण मिट्टी के दीया की मांग नहीं के बराबर रह गई है। फलस्वरूप दीपावली के मौके पर भी चाक से दीया बनाने वालों के घर में खुशी नहीं आती। इनलोगों द्वारा कमोवेश जो दीया बनाया जाता है, उसकी भी बिक्री नहीं हो पाती। इस जाति के समक्ष भुखमरी की नौबत उत्पन्न हो रही है।

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पुश्तैनी धंधा से मुंह मोड़ने लगे हैं लोग
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कुछ वर्ष पूर्व तक कुम्हार जाति के लोग दीपावली की महीनो तैयारी करते थे। जगह- जगह से मिट्टी और तैयार दीया को पकाने के लिए सामग्री इकट्ठा किया जाता था। दीपावली के मौके पर दीया बेचकर इन लोगों को अच्छी आमदनी होती थी, परंतु अब इस पेशे में कोई दम नहीं रहा है। पहले लोग खपड़ा का घर बनाते थे तो इसकी बिक्री से उन लोगों का गुजारा चलता था, परंतु अब खपड़ा का घर लोग नहीं के बराबर बनाते। इसके चलते इसकी मांग पूरी तरह समाप्त हो गई है। ऐसे में इस जाति के लोग मजदूरी कर या रिक्शा- ठेला चलाकर अपने परिवार की परवरिश कर रहे हैं। रोजी की खोज में अधिकांश लोग पंजाब, दिल्ली व अन्य प्रांतों में भटकते हैं।
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क्या कहते हैं कुम्हार जाति के लोग
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मुरलीवसंतपरु के सुकन पंडित करते हैं कि पहले वे लोग दीपावली में अच्छी आमदनी कमा लेते थे, परंतु अब मिट्टी के दीया के शक्ल की लाईट भी बाजार में बिकने लगी है। लोग उसी का उपयोग करते हैं। वे लोग जो दीया बनाते हैं वह भी नहीं बिक पाता। सुलिन्दाबाद के रामदेव पंडित कहते हैं कि पहले वे लोग सालोभर मिट्टी के बर्तन बेचते थे, अब तो मेले में भी मिट्टी का खिलौना नहीं बिक पाता है। महिषी के मनोहर पंडित का कहना है कि जब से सरकार से छतदार मकान का प्रावधान कर दिया है, कोई खपड़ा खरीदनेवाला भी नहीं मिलता। सरकार उनलोगों के रोजगार के लिए कुछ सोच नहीं रही है और न ही दूसरे रोजगार के लिए कोई सहायता दी जा रही है। ऐसे में वे लोग रोजी की खोज में पलायन करने के लिए मजबूर हो रहे हैं।


बदहाल हैं बांस के कारीगर

सहरसा। जिले में बांस के कारीगरों की स्थिति काफी बदहाल बनी हुई है। हिन्दुओं का महापर्व छठ पर्व में बांस की कमाची से सूप व डगरा बनानेवालों की जिदगी अंधकारमय है। घर में खाने का जुगाड़ बड़ी मुश्किल से होता है। शहर के सड़क किनारे व जगह-जगह बसे इन परिवारों की जिदगी बांस से बनी सूप, डगरा व टोकरी पर टिकी हुई है। लेकिन आधुनिकता के इस दौर में इनकी मेहनत का वाजिब मूल्य नहीं मिलता है। शहर के गांधी पथ, गंगजला, शिवपुरी, नया बाजार सहित अन्य इलाकों में बसे इन परिवारों के पास सूप व डगरा बनाने का पुश्तैनी धंधा सदियों से चला आ रहा है। बांस से निर्मित सूप, डगरा, टोकरी सहित शादी ब्याह के मौके पर बनने वाले अन्य सामान कई वर्षों से बनाते आ रहे हैं। लेकिन इन्हें मजदूरी का पूरा दाम नहीं मिल पाता है।
सूप बनाने वाले बांस के कारीगर अरूण मल्लिक, सोहन मल्लिक, अरविन्द, बेचनी देवी, रेशमा देवी, कालो कहते हैं कि दिन भर एक कच्चा बांस को छिलकर कमाची बनाने में ही निकल जाता है। इसके बाद भर दिन में चार से पांच सूप एक आदमी बना पाता है। सूप पहले तो सस्ते में ही विक्रेताओं द्वारा खरीद लिया जाता है। लेकिन पर्व नजदीक आते ही विक्रेता सूप व डगरा, टोकरी की डिमांड बढा देते हैं। ऐसे में घर के सारे सदस्य जी तोड़ मेहनत कर विक्रेता की डिमांड को पूरी करने में लगा देते है। बाजार में एक कच्चा बांस 200 से 250 रूपये में मिलते है। इसके बाद दिन भर का मेहनत अलग। फिर भी बड़ी मुश्किल से घर का खर्चा चलता है। इनके बच्चों को स्कूल भी नसीब नहीं होता है। बचपन से ही जीने का संघर्ष देख इनके बच्चे अपने पुश्तैनी धंधा में ही हाथ बंटाते हैं। अरूण बताते हैं कि वे पिछले 20 वर्षों से सूप व डगरा बनाते आ रहे हैं। इन वर्षों में महंगाई दस गुणा बढ गयी है लेकिन इनकी आमदनी नहीं बढ़ी है। पूरे दिनभर की मेहनत में 100 से 200 रूपये रोज कमा पाते हैं।

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