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Monday, August 5, 2019

खबरें जरा हटके:मुस्लिम शिक्षा : पढ़िए इकबाल राजा की खास रिपोर्ट

कोशी लाइव:
मुस्लिम शिक्षा : पढ़िए इकबाल राजा की खास रिपोर्ट

इस दौर में लोगों का यह ख्याल बन गया है कि मुसलमानों ने केवल दीनी शिक्षा पर ही काम किया है।दुनियावी शिक्षा से उनका कोई ताल्लुक नहीं रहा। हालांकि दुनिया का कोई इल्म (ज्ञान) ऐसा नहीं जो मुसलमानों का अहसानमंद ना हो। कुछ नमूने में इसके पेश करता हूं- ज्योगराफी अलखवा रिजमी ने सबसे पहले ज्योगराफी पर किताब लिखी, फिर मोहम्मद बिन मोहम्मद अल इदरीश ने अल ममालिक वल मसालिक नामी किताब में इंटरनेशनल तिजारती रास्तों को नख्शे के साथ लिखकर तिजारत के रास्तों को आसान कर दिया, इसके अलावा दूरबीन अबुल हसन ने बनाई। इबने युसूफ ने पिन्डोलम और इबने माजिद ने कुतुब नुमा तैयार किया। बारुद के साइंस डॉ. फतहुल्लाह और फोटोग्राफी इब्नुल हाशिम की देन है। इतिहास गवाह है कि दुनिया का सबसे पहला समंदरी लड़ाकू जहाज हज़रत मुआविया र.ज. ने बनाया। मैथ्स अरब का पसंदीदा सब्जेक्ट था। इस मैदान में जीरो की ईजाद अरबों का कारनामा है जिससे हिसाब बहुत आसान हो गया। अलजबरा और टिरिगनोमेटरी की शुरुआत भी अरबो ने ही की कोर दि वॉव अपनी मशहूर किताब लेगेसी ऑफ इस्लाम में मुसलमानों की इल्मी तरक्की का जिकर करते हुए कहता है- ''अरबो ने साइंस में बे-मिसाल तरक्की की है। उन्होंने ही जीरो की ईजाद की और इसका उपयोग भी सिखाया। उन्होंने अल जबरा को एक इल्म का दरजा दिया जिसका इल्म यूनानियों को भी नहीं था। इसी तरह अगर बॉटेनी की तरफ रुख करते हो तो नुमाया तरीन साइंस दा इब्ने ब्यतार से आपकी मुलाकात होगी जिनकी किताबों को सोलहवीं सदी तक इस इल्म की सबसे मुसतनद किताबें तसलीम किया जाता था और अगर आप केमिस्ट्री की तरफ रुख करते हो सबसे पहले जाबिर इब्ने हय्यान का नाम होगा। आपको इस फन का आदम भी कहा जाता है। केमेस्ट्री में इनकी खिदमत का एतराफ एक बहुत बड़े साइंसदा मेक्स मैयर हॉफ ने भी किया है वो लिखते हैं यूरोपियन केमिस्ट्री पर जाबिर कि किताबों का असर नुमाया नजर आता है। आपके बनाए हुए केमिस्ट्री के फॉर्मूले आज भी पढ़ाए जाते हैं। अगर आप फिजिक्स की तरफ कदम बढ़ाते हो तो आपको मालूम होगा कि इस इल्म को मुसलमानों ने बहुत से स्कॉलर दिए हंै लेकिन किन्दी एक ऐसे स्कॉलर हैं जिन्होंने फिजिक्स, केमिस्ट्री और मोसिकि पर 265 अहम किताबें लिखी। अगर हम मेडिकल साइंस के मैदान में कदम रखते हैं तो इस मैदान में मुसलमानों ने बू अली सीना, जकरिया राजी और मजूसी जैसे दुनिया के अजीम तरीन डॉक्टर्स दिए, आप साइंसी दुनिया के किसी भी विभाग में नजर दौड़ाओगे तो आपको मुसलमानों के कारनामें नज़र आएंगे। आज हाल यह हो गया है कि इन महान मुस्लिम साइंसदानो से हमारे तालीम याफ्ता लोग भी ना वाकिफ है। जाबिर इब्ने हय्याज जो हजरत जाफर सादिक के शिष्य थे। केमिस्ट्री में आपकी खिदमात बहुत अधिक है। इस इल्म में आपने बाईस किताबें लिखी जो आज भी अरबी भाषा में मौजूद है।  इसी तरह अबुल कासिम इब्नुल अब्बास एक महान सरजन थे जिन्होंने इंसानी जिस्म की तहकीक के लिए पोस्टमार्टम पर जोर दिया। आपकी प्रसिद्ध किताब किताबुत्तसरीफ आज भी यूरोप के मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई जाती है। लेकिन मुसलमानों के इन कारनामों के बावजूद आज अफसोस होता है कि जो कौम कभी इल्म के आला मेयार पर कायम थी जिस कौम की उंगली पकड़कर यूरोप ने अपना इल्मी सफर शुरु किया था। आज वो कौम इल्मी मैदान में पिछड़ती हुई नजर आती है। आज मुसलमान इल्मी मैदान में दूसरी कौमों का मोहताज है, हमको चाहिए कि हम अपने असलाफ की याद को ताजा करें और अपने बच्चों को दीनी व दुनियावी दोनों तालीम जरुर दिलाए ।

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