मधेपुरा: कविता "मेरे पिता" : धीरज कुमार - कोशी लाइव

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Sunday, 16 June 2019

मधेपुरा: कविता "मेरे पिता" : धीरज कुमार

कोशी लाइव:अक्की

धीरज कुमार एक ऐसे छात्र जो बचपन से कविता लिखने,व पढने के शौकीन रहे हैं । जो मुरलीगंज प्रखंड के रजनी गाँव में एक मध्यम वर्गीय किसान परिवार  से संबंध रखते हैं ।कविताओं के प्रति इनकी रूचि अपने पिता श्री सूर्यनारायण यादव की प्रेरणा से जगी है । इन्हें बचपन से ही वो कविता सुनाते रहते थे। धीरज वर्तमान में ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा में बी एड प्रथम वर्ष के छात्र हैं ।इन्हें समसामयिक विषयों पर लिखना व उन्हें कविताओं में ढालने की विशेष रूचि है।
Father's day special poem by:Dheeraj

☆                  मेरे पिता

                                           धीरज कुमार
                                           छात्र, बी एड
                             ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय

 पिता ने  ऐसा  दिया  दुलार ,
माता का कम पर गया प्यार।
मेरी   बातों    का   वे  कभी,
नहीं        किए       इनकार।।

पिता      समझाते     हमको,
 इस                        प्रकार।
 कि          ना    हो      हमसे,
किसी के साथ कोई दुर्व्यवहार।।

 ना         हमें             दिया ,
कभी      भी           फटकार।
 दुलारा-पुचकारा    दिन    में
 सौ-सौ                       बार।।

महापुरुषों की जीवनी और,
किस्से सुनाए हजारों- हजार
भाई,पिता, गुरु,दोस्त का,
समय-समय पर दिया प्यार।

 ऐसे पिता को ना होने देंगे,
 कभी       भी      लाचार।
 इन  पर  ना   होगा  कभी
 जरा     भी     अत्याचार ।।

क्योंकि      पिता      नहीं ,
मिलते            बार-बार।।
 पिता         का      ऋण
कभी नहीं पाएंगे उतार।।

ये          हैं          मानो
भगवन्     के   अवतार।
     -  पूजन-अर्चन-वंदन,
 करूं    मैं      बारंबार।।

 सचमुच   आदरणीय  है,
 पिता   का     व्यवहार ।
 सोचकर         गर्वान्वित ,
होता     रहता    बारंबार ।।

अगर   पिता  का  मिलता,
 रहे    सब    दिन    प्यार।
 पाएगा    ना    कोई   कभी
अपने को बेबस और लाचार।।
बच्चों     पर     पिता      का,
 सबसे  पहला  है  अधिकार।।।

                           

  इनकी एक कविता "माँ" शीर्षक से ।
: "माँ"
               
माँ   तो  होती   है बस -   "माँ" ।
माँ जैसी   हीरा  मिले   कहाँ ।।
इनकी तो बस बच्चों में ही है जहां ।।।

हर      कुछ       करती,
अपने  बच्चों  की  खातिर ।
चाहे  हो  कोई  भी   माँ ,
यह  बात   है    जाहिर।।

माँ    तो   बच्चों  की  खातिर,
 हर कुछ करने को रहती तैयार ।
वह   तो   गाली   बात क्या ,
खा      लेती    है        मार।।
ऐसी    माँ   को      कभी
मत    करना     लाचार ।
माँ  की  आँचल  में   ही,
 समझना   अपना  संसार।।

माँ है एक अनमोल धन ।
इसे समझने का करो जतन।।
इससे बड़ा न इस जहां में कोई रतन।।।
                   
                     - धीरज कुमार
             छात्र, ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय

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