मनोज वशिष्ठ, मुंबई। अस्सी के दशक में वीकेंड सेलेब्रेट करने के लिए जब VCR किराए पर लाना किसी लग्ज़री से कम नहीं था... बच्चों से लेकर बड़े तक, रातों की नींद एक के बाद एक तीन फ़िल्मों पर लुटाने को बेक़रार रहते थे... उस दौर में श्रीदेवी अपनी ख़ूबसूरती, शोखियों, शरारत और चुलबुलेपन से बच्चों और बड़ों को समान रूप से दीवाना बना रही थीं... ख्वाबों की शहज़ादी बनकर वो हर दिल पर छा रही थीं। 
श्रीदेवी के अचानक जाने से स्तब्ध दर्शकों का वो तबका सबसे ज़्यादा आहत महसूस कर रहा होगा, जिसका बचपन श्री की चंचलता के नाम रहा और जवानी उनकी शोखियों पर क़ुर्बान हुई। जवां दिलों को प्यार करने के लिए उनके जैसी ख़बसूरती की तलाश रहती थी तो प्रेमिका के हवा-हवाई नख़रों को ज़मीन पर उतारने के लिए श्रीदेवी जैसी सुंदरता की उलाहना दी जाती थी। कहते हैं कि अगर बच्चे मोहब्बत करने लगें तो किसी भी कलाकार की उम्र लंबी हो जाती है। श्रीदेवी को उन्हीं बच्चों ने अगले कई सालों तक स्टारडम की बुलंदियों पर बिठाकर रखा। उन्हें अंतिम विदाई देने मुंबई के सेलीब्रेशन स्पोर्ट्स क्लब के बाहर लगी चाहने वालों की लंबी लाइन उनके जगमगाते स्टारडम की गवाह है।
श्रीदेवी दक्षिण भारत से आयी उन अदाकाराओं की लीग में शामिल हैं, जिन्होंने भाषाई बंदिशों के बावजूद हिंदी भाषी दर्शक से ऐसा संबंध स्थापित कर लिया था कि वो उन्हें अपना मानने लगा था, उन पर दिलो-जान लुटाने लगा था। श्री के सम्मोहन में बंधा हिंदी दर्शक कभी महसूस ही ना कर सका कि पर्दे पर जिस लरज़ती आवाज़ को सुनकर उसके दिल के तार बज उठते हैं, वो आवाज़ श्रीदेवी की नहीं, किसी और की है। श्री तो बस होंठ हिला रही हैं। अगर समानांतर सिनेमा को अलग रखकर बात करें तो अस्सी का दौर सिनेमाई उत्कृष्टता के लिहाज़ से बहुत उन्नत नहीं माना जाता।
मुख्यधारा के ज़्यादातर कलाकार फ़िल्मों की क्वालिटी के बजाए क्वांटिटी पर ज़ोर दे रहे थे। ऐसे माहौल में जब क्वांटिटी के साथ क्वालिटी देना किसी चुनौती से कम नो हो, श्रीदेवी ने इसे सिर्फ़ स्वीकार किया, बल्कि अपनी अदाकारी से अपनी समकक्ष अभिनेत्रियों के सामने कड़ी चुनौती भी पेश की। इसी दौर में पद्मिनी कोल्हापुरे, रति अग्निहोत्री, फ़राह नाज़, मीनाक्षी शेषाद्री, अमृता सिंह, मंदाकिनी, किमी काटकर, माधुरी दीक्षित, जूही चावला और भाग्यश्री जैसी अभिनेत्रियों ने सिल्वर स्क्रीन पर ज़ोरदार दस्तक दी। इनमें से कुछ अदाकारी के हुनर के लिए, तो कुछ बेहिसाब ग्लैमर के लिए मशहूर हुईं, जबकि कुछ ने दोनों ही मोर्चों पर ख़ुद को साबित किया।
हिंदी सिनेमा में अभिनेत्रियों की एंट्री होती रही, मगर श्रीदेवी ने कभी ख़ुद को किसी संकट में महसूस नहीं किया। सबसे बेख़बर अपने काम में मशगूल रहीं। दक्षिण भारतीय सिनेमा के संग-संग हिंदी सिनेमा को भी अपनी अदाकारी से सजाती रहीं। अस्सी का दशक आते-आते दक्षिण भारत की मसाला फ़िल्मों को हिंदी में रीमेक करने का चलन जुनून की हद तक बढ़ चुका था। वहां के निर्देशक तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ भाषाओं की फ़िल्मों को हिंदी सिनेमा की स्टारकास्ट के साथ रीमेक कर रहे थे और इन रीमेक फ़िल्मों के लिए पहली पसंद श्रीदेवी ही होती थीं।
श्रीदेवी ने जिस फ़िल्म से 1979 में हिंदी सिनेमा में मुख्य अभिनेत्री के तौर पर क़दम रखा, वो तमिल फ़िल्म 16 वयथीनीले का रीमेक थी। हिंदी में इसका शीर्षक रखा गया- सोलवां सावन। तमिल फ़िल्म में जहां कमल हासन और रजनीकांत ने श्रीदेवी का साथ दिया, तो हिंदी संस्करण में अमोल पालेकर कुलभूषण खरबंदा ने उनकी जगह ले ली। वैसे 1975 में आयी म्यूज़िकल ब्लॉकबस्टर जूली श्रीदेवी की पहली फ़िल्म मानी जाती है, जिसमें उन्होंने प्रधान नायिका लक्ष्मी की छोटी बहन का किरदार अदा किया था। ये फ़िल्म भी दक्षिण भारतीय फ़िल्म का रीमेक थी।
इसके बाद सदमा, हिम्मतवाला, जस्टिस चौधरी, जाग उठा इंसान, इंक़िलाब समेत दो दर्ज़न से ज़्यादा रीमेक फ़िल्मों की श्रीदेवी प्रधान नायिका बनीं और इनमें से अधिकांश में उनके नायक जंपिंग जैक जीतेंद्र रहे। तारीफ़ की बात ये है कि दक्षिण से आयीं कई अभिनेत्रियों ने हिंदी सिनेमा में कामयाबी मिलने के बाद जहां अपनी मातृभाषा के सिनेमा को नज़रअदाज़ करना शुरू कर दिया था, वहीं श्रीदेवी दक्षिण भारतीय सिनेमा के साथ सामंजस्य बिठाते हुए हिंदी सिनेमा की भी सिरमौर अभिनेत्री बनती चली गयीं।
28 फरवरी को आज वो अपने अंतिम सफ़र पर निकल रही हैं। उन्हें अलविदा कहते हुए हज़ारों आंखें नम हैं। किसी अपने के रुख़सत होने की कसक दिल को कचोटती है। मगर, श्रीदेवी अपनी फ़िल्मी विरासत में हमेशा  चांदनी की तरह जगमगाती रहेंगी।